Wednesday, 6 June 2018

દૂહા

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साधो ये मुर्दों का गाँव..

पीर मरे, पैग़म्बर मर गये,
मर गये ज़िन्दा जोगी।
राजा मर गये, परजा मर गये,
मर गये बैध औ रोगी॥

चन्दो मरिहै, सुरजो मरिहै,
मरिहै धरनी अकासा।
चौदह भुवन के चौधरी मरिहै,
इन्हुं की क्या आसा॥

नव भी मर गये, दस भी मर गये,
मर गये सहस अठासी।
तैंतीस कोटि देवता मर गये,
पड़ी काल की फाँसी॥

नाम अनाम रहत हैं नित ही,
दूजा तत्व न होई।
कहै *कबीर* सुनो भाई साधो,
भटक मरो मत कोई॥

- कबीरदास जी

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