दयानंद गुणगान
शंख जैसी ग्रीवा जीसका कंठ कामणगार है
वाणीमे चारो वेद ऋचा सट शास्त्र सार है
रोहीत कमल जैसे दोनु नयन मरोड दार है
द्ष्टी मे दिव्य तेज भरा प्रेम पियुष धार है
गुलाब वर्ण गाल है विशाल भव्य भाल है
दंत पंक्ति मणी माणेक मोतीओकी हार है
ओष्ठ युग्म सहज सारे प्रश्न का जवाब है
देव दयानंद ऋषि वेद भाष्य कार है
वृक्षस्थल शेर जैसा बाहुओ अजान है
योगी है अवधूत ब्रह्मचारी बलवान है
सत्य वक्ता दिर्घ द्ष्टा दयाका भंडार है
कातिलको जीवनदान दीया कैसा वो दातार है
देश भक्त निराशक्त धृति धैर्य वाहन है
आत्म ज्ञानी परम ध्यानी मेधावी महान है
पाद चिन्ह पग दंडी श्रृति ईश विधान है
आंबालाल गुरु देवको प्रणाम बार बार है
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