Saturday, 22 October 2016

અછાંદસ

पंखी पांख पसारे
         धनेश मकवाणा

मने देखाय
उडतुं पंखी
मारा अंतर मनमां
घीरेकथी हलचलतुं
पछी
खळभळ करतुं
बारीमांथी बहार
चाल्युं जाय छे
पेली नदीना
तट पर बेसी
घूटडे घूटडे
पाणी पीवे
अने
मारी नसनसमां
हळवी लहेरो ऊडे
नोळवेल ऊगी समजो
पछी
खलिपो थयो
थोडिक इच्छाओनो
सळवळाट करे
पांख पसारी
जाय दूर.....दूर...

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