जख्मो हवे गणुं तो नाराज दर्द थाशे,
गजलो नवी लखुं तो नाराज दर्द थाशे,
फोरम बनीने म्हेके,कंटक ज फूल संगे
झाकळने कइ कहुं तो नाराज दर्द थाशे,
ज्यां साथ लागणीने,आंखो रुदनथी आपे
हुं संग ना वहुं तो नाराज दर्द थाशे,
तुं पानखरनी माफक,समजी भमर क्यां चिडवे,
ना जो विरह सहुं तो नाराज दर्द थाशे,
सर्जक हजीय सळगे,पाषाण आवरणमा
थइ मीण ओगळुं तो नाराज दर्द थाशे,
गौतम परमार "सर्जक"
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