शिखर पर धारणाओनी कसोटी पण करी लईऐ
हवानी ल्हेरखी आवे तो थोडुं फरफरी लईऐ
तुं मारा शुष्क सपनाने जरा आवी अने भिंजव
हवे झाकल जरा तुं आव,अमथुं झरमरी लईऐ
आ मारी पोठ तो खाली हती खाली ज रहेवानी
उदासी. तो उदासी खूब ठांसीने भरी लईऐ
तुं अंधारे के अजवाले सतत चूपचाप शोधे छे
अमारी ऐ ज ईच्छा के तने पण छेतरी लईऐ
अनोखुं आत्मवत् आकाश ऐकाकार लागे छे
फरी ,कणकणमां विखराई जईने विस्तरी लईऐ
भरत भट्ट
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