सुबहकी कवायत तु फिर आज कर ले।
नईसी शरारत तु फिर आज कर ले।
खरोंचे रखी खिड़किया खुदाकी,
यु अपनी वकालत तु फिर आज कर ले।
लकीरे समेटी सजाया यु खुदको
भुखोकी हिमायत तु फिर आज कर ले।
मरेगा अकेला बुलंदी छुकरभी,
जरासी शराफत तु फिर आज कर ले।
समय के थपेड़े सही से समजले,
पुरानी इबादत तु फिर आज कर ले।
-शीतल गढवी"शग"
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