*सहियारी ग़ज़ल*
*तृप्ति त्रिवेदी "तृप्त" और "आभास"*
घर के कोने में दुःख सह कर बैठा नहीँ जाता!
उसकी यादोसे आज भी रूठा नहीँ जाता।
कीतना भी अच्छा हो ख्या ल तो क्या हुवा?
तेरी यादो के सहारे कमरा सजाया नहीं जाता।
दिन-रात, ख्वाब, अरमान और मेरा जिस्म,
तुम्हारे बिना आज भी सजाया नही जाता!
प्यार तो बहोत है मेरे दिल में आज भी तृप्ति,
बस होठो से सामने जताया नहीं जाता।
एक बार ही मीली है तो जिलो यारो होंश में,
जिंदगी को बिना जीए गवाया नहीं जाता।
सवाल उठ रहे है मनमे हदसे ज्यादा,
जवाब जाने बिना उसे बैठाया नही जाता।
एक दिन आप आएंगे मध्याह्नकी तरह,
इसिलए आजभी मुजसे सुरजको सताया नही जाता!
एक ओर हवा दो राख हो जाएगा 'आभास ',
ए जिंदगी जले हुए को जलाया नही जाता।
सूखी हुई नदि के किनारे का दर्द जानती हूं,
पर न जाने क्यू आज कलम को बताया नही जाता।
तृप्त हूं आज इसीलिए न कोई आश अभिलाषा मुझमे,
सिर्फ, यही आभास से इच्छाको दुबारा दोहराया नही जाता।
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