Monday, 2 January 2017

ગઝલ

गझल : विजय राज्यगुरु

साद हळवो पण तमे ठालो ना कर्यो एक्के !
होठ पर आव्या शबद हुं क्यां उच्चर्यो एक्के ?

कैंक करगठियां अमे वीण्यां तापणी करवा ;
पथ्थरो टूट्या, तिखारो तो ना खर्यो एक्के !

झांझवानां जळ थयां गायब, सूर्य ढळतामां,
आ परबनो में हजी गोळो, क्यां भर्यो एक्के !

नाव डूबीने तळे बेसे, ते समज आवे ;
पण किनारे क्यां तरापो ये लांगर्यो एक्के !

आरती टाणे घरे पाछां ट्रेक्टरो आव्यां ,
ने गमाणे क्यां हवे खीलो भांभर्यो एक्के ?

( गालगागागा लगागागा गालगागागा )

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