Monday, 30 January 2017

છંદ

.       [ मार जमडा मारशे ]
        रचना - चमन गज्जर

               ( दुहो )
घट घट नफट बिचार कर, खोट मेल खटपट,
कपट तजी तुं कानने, जटपट रदिये रट.

            ( छंद - हरीगीत )
कट जात जट दन उंमर को रट राम मुख उहचार कर,
घट घट समर हरी नाम जट पट राह सत निरधार कर,
तज कपट शठ तज सकल खटपट चमन तन सळगी जशे,
किरतार नर संभार नहितर मार जमडा मारशे.

आतम वस्यो परमातमा आ गहन गोतो ग्यान ने,
पंचात चोवट मेल पाछी धार मन हरी ध्यान ने,
अंते अचानक हाथनी बाजी बधी बगडी जशे,
किरतार नर संभार नहितर मार जमडा मारशे.

भगवान ल्ये छे जान साचुं मान तज अभिमान ने,
तन तान धरी करी गान भगती धार मन भगवान ने,
विदवान ने गुणवान ने धिरवान पण धृजी जशे,
किरतार नर संभार नहितर मार जमडा मारशे.

जे नाम रटतां पाप हटतां दुख कटतां देह में,
अंते अखटतां जात जटतां सरग खटतां ते समे,
आयुष्य घटतां मरीय मटतां तेह रटतां तारशे,
किरतार नर संभार नहितर मार जमडा मारशे.

नरके जशुं सरगे जशुं आ सकल चिंता छोड तुं,
मन मोज आठो जाम करी चित 'चमन' हरी संग जोड तुं,
गोखेल वेदां ग्यान सघळुं अंत आघुं रही जशे,
किरतार नर संभार नहितर मार जमडा मारशे.

         ( छप्पय )
श्याम नाम संभार, बार दध तरण रू तारण,
बंधन बिदार संसार सार भव भार उतारण,
सिध्ध  दैन हरी लैन बिपत सब पाप प्रजारण,
रखण लाज धर धर्म काज दैतां दल मारण,
अंत समय ईह आशरो, गत मुगत पल में मले,
कवी 'चमन' नाम शरी राम को, समर जीव पल पल पले.

         [ चमन गज्जर ]

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