मैंने तो इस इंसानोमे कंकर पाया।
या फिर उनके ईमानोमे खंजर पाया।
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर से थे ईश्वर गुम,
गलतियों के इकरारोमे पंटर पाया।
धरती का बेटा खाली कर लिए लौटा,
जो सब बोया ईनामोमे बंजर पाया।
तितलियों की पंखो को देखा बेरंगिन,
फूलों के उस ईरादोमे मंतर पाया।
किनारोसे रूठकर वापस लौटी लहरें,
मीठे जल के ईजाफोमे जंतर पाया।
-शीतल गढवी"शग"
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