Tuesday, 24 January 2017

ગઝલ

ब्हारथी लागु छुं  फेलाई गयो
मारी भीतर हुं  समेटाई  गयो

बोल पडतांवेंत चर्चाई गयो
चूप रहेवाथी वगोवाई  गयो

ताकानी माफक उखेलाई गयो
सोय  दोराथी  हुं  सिवाई  गयो

मौन  रहेवाना  प्रयासोमां  हजी
अस्खलित हुं केम बोलाई गयो

हुं तने परखी शकुं क्यारेय क्यां
पारखुं  लेवामां   परखाई  गयो

सीधे रस्ते पण कदी चाल्यो नहीं
केडीओमां   केम   फंटाई   गयो

आ छे मारी भीतरनो खूणो
केटला  बिंदुऐ  छेदाई  गयो

आयनो पेली तरफ अकबंध छे
आ तरफ हुं केवुं  तरडाई  गयो

ऐ स्वरुपे तुं कदाचित होय तो
अग्निस्थंभे साव  चंपाई  गयो

आ रीते क्यां प्रार्थना थई छे कदी
कंठमां  डूमो  तो  टहुकाई  गयो

तोय क्यां नवनीत पाम्यु कोईपण
बहार - भीतर  हुं  वलोवाई  गयो

      .     भरत भट्ट

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