Monday, 30 January 2017

ગઝલ

तेरी सूरत में  है कशिश बहोत,
है जीसने बढाइ खलिश बहोत।

तु  कर इनायत इस नाचिज पर,
तुम बीन अब हे रंजिश  बहोत ।

तुम्हें देख जी अपना भरता नहीं
तुम्हे पाने की है ख्वाहिश बहोत ।

बीना  तेरे सुने हैं  दिन रात  मेरे
न कर अबतु आजमाइश बहोत

अब मिलना अपना आसान करदे
हो चुकी  हे मासूम काविश बहोत ।

                  मासूम मोडासवी

No comments:

Post a Comment