Saturday, 18 February 2017

ગઝલ

तत्काल लगी रोक मिरे शक ओ शुबा को
आज़ाद किया मैंने तभी अपने खुदा को
काफिर ही समझ लें तो ना फर्क पड़ेगा
उठते ही नहीं हाथ मेरे आज दुआ को
अपने दिल का मैल नहीं देख पाए
माथे पे मिरे डाल दिया और बला को
बेकार के इलज़ाम लगे खौफ़ज़दा हूँ
में टाल नहीं सकती मिली सख्त सजा को
कमबख्त मुहोब्बत का है इतना सा फ़साना
संभाल के रखना है मुझे अपनी अना को
रुख देख के बाजार का सौदा भी करेंगे
पहचान लिया हमने यहाँ दौरे हवा को
गरवी

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