Sunday, 19 February 2017

અછાંદસ

मनकी बात

जाना-पहेचाना...!
करीबका रिस्ता,
छोटी उम्र मेरी और बडा फरिस्ता,
क्युं तुजसे मीलना होता है?
रंगीन रंगोमे पली-बडी हुई..!
पता कर..!
सुबहमें क्युं फूलोका खिलना?
या फीर रातको चांदसे मीलना और
गगन के छीद्रमे सितारोको बुनना,
शितलताका दुसरा नाम उपवन..!
विहंगी उडान लिये
पलक जपकमे क्युं पुष्पोका बिछोना मखमली बने !
ये हवा एसेही तुजसे मेरा जीना जैसे
हरदम...!
सांसोमे सुवास समेटता भीतरका सबेरा..!
कुसुम बना,
एक दिन के लिये खिलना ...!
फिर यु बिखरना..!
मुरजाती रातको
सुलजाती बातोको
खीलना है तो...?
खुलना है तो..?
प्रात:काल तीन कालोमे..!
सुबह,शाम के बीचका फासला,
दोपहरमे बटां..!
ऩिश्चित अंधेरोमे होता होगा ये हुन्नर  करिश्मा..!
मनकी मनमानी जैसे
मनकी फरमाईशोमें जैसे हवाका बिछडना !
अचेतन मन,
पल-पल मनकी बात
करती-केहती
मौन अपने आपसे मीलती और
हर दिन कहेती...!
करती हुँ...
रातका ईन्तजार ..!
फूलोकी बगीयाँमे बेठी तीतली और
मेरी....!
उनकी..!
आपसमे ही हुई,
सही-सही मुलाकात और
मनकी बात..!

जाग्रुति मारु "जागु" महुवा
दिनाक-19-2-2017
वक्त-दोपहेरको-03:55

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