क्या दर्द है जो दिल से बेहद उछल रहा है।
शायद किसी गली में ईमान जल रहा है।
उलफत की आरजु में इतना बिखर न जाना,
बेखोफ होके दरिया शायद मचल रहा है।
पागल समझ के कोई दिल से गुजर गया है,
कैसे बताए कोई सपनों में पल रहा है।
नाचीज दिल मेरा आखिर समझ ना पाया,
वो कौन है जो मेरी सासो में ढल रहा है।
नजरें उठा के देखो, तनहाइओ को रोको,
मेरा ही खाब मेरे मन को निगल रहा है।
आवाज की गली में यारो पुकार लेना,
मेरा जमीर मेरे जजबात छल रहा है।
.....वर्षा प्रजापति
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