Saturday, 11 February 2017

ગઝલ

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ग़ज़ल- महबूब सोनालिया

तुम्हारी याद मेरे दोस्त इस क़दर आए
फ़रार क़ैद से हो कोई जैसे घर आए

ग़मे-हयात तुझे किस तरह छुपाऊं मैं
तू साफ़-साफ़ मेरे शे'र में नजर आए

उधर तो बाम पे गेसू सवारे जाते हैं
इधर नसीब मेरा ख़ुद-ब-ख़ुद संवर आए

उदास रहने से तो मुस्कुराना अच्छा है
मैं मुस्कुराने लगूं तो भी आँख भर आए

फ़रेब है ये नज़र का या शिद्दते-एहसास
हरेक शय में तेरा अक्स ही नज़र आए

उड़ान भरने को बस हौसला ज़रूरी है
नज़र ज़माने को मेहबूब सिर्फ पर आए
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