Wednesday, 22 February 2017

ગઝલ

फिर उसी राह पर मुज को चलना पड़ा!
जब बदलने की रुत थी, बदलना पड़ा!

खुद मुझे अपनी राहों में जलना पड़ा!
यूँ अंधेरों को अपने निगलना पड़ा!

चल दिये वो दफन कर के मेरा वजूद,
आप अपने ही फूलना और फलना पड़ा!

कब सफ़र ये शराफत का आसान था?
लड़खड़ाते रहे पर संभलना पड़ा!

रुख हवाओं का माना बहोत तेज़ था,
मैं दिया था, मुझे तब भी जलना पड़ा!

यूँ उजालों पे अपने गुमां था जिसे!
वक्त आने पे उस को भी ढलना पड़ा!

जिंदगी खुद के दम पर गुज़ारी मगर,
आज औरों के कंधों पे चलना पड़ा!

: हिमल पंड्या

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