Wednesday, 1 March 2017

ગઝલ

बात जो दिल में थी वो बयाँ कर गया!
तेरा चेहरा तेरी दास्ताँ कह गया!

मुश्कुराने की कोशिश को नाकाम कर,
एक आंसू सा छलका जरा, बह गया!

पूछता है ये तन्हा सा, हैरां सा दिल!
तेरे वादों का मौसम कहाँ ढल गया?

साथ मिल कर मुकम्मल करेंगे उसे,
एक किस्सा अधूरा सा जो रह गया!

जान से भी दुलारा था एक हमसफ़र;
रूठ कर जाने वो कौन से घर गया?

एक परवाना जलती शमा देख कर;
खामखाँ बेवजह आग में जल गया!

ऐसे अपने मुकद्दर से शिक़वा न कर;
आएगा कल वही वक़्त जो कल गया!

: हिमल पंड्या

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