ख्वाबों में तेरे रात भर तडपा हुं क्या करुं,
मिलने को खाली आसका सपना हुं क्या कहुं।
तुमपे निसार हो के भी तुमको न पा सकुं,
अपनी ही निगाहों में तमाशा हुं क्या कहुं।
बढती गइ है दिलमें तुम्हें पाने की आरजु,
तेरे बगेर कीतना अकेला हुं क्या कहुं।
मुजको सता रहा है तेरी तनहाइयों का गम,
तेरे करीब रहेके भी तनहा हुं क्या कहुं।
मासूम खलवतों की सजा हम जेलते रहे,
फुरकत में तेरी कीस कदर जलता हुं क्या कहुं।
मासूम मोडासवी
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