Wednesday, 19 April 2017

ગઝલ

गझल

ऊंडे उतरे तो जरा अमथुं के खूपे केटलुं
ऐक माणस छिछरा सरवरमां डूबे केटलुं

सामटा रंगो भले ने होय तारी पासे,पण
रंगथी आकाश जेवुं  मन तुं  पूरे  केटलुं

स्थाननो छे प्रश्न ईजानी न मात्रा पूछीऐ
मर्मस्थाने  थोडुं वाग्युं होय, दुखे केटलुं

केटलामी वार तूटवानुं हतुं तूटक तूटक
ऐक  तूटेलो  अरीसो आम  तूटे  केटलुं

पांख कापीने तमे उडवा विषे ट्हुक्या जरा
कोई पंखी आभमां के  मनमां ऊडे  केटलुं

                 भरत भट्ट

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