Saturday, 29 April 2017

ગીત

बसंत

हरखि  हरखि  आई बसंत,
     गुन-गुन  राग  छेड़ा  रे
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !

प्रेम सरगम झनक झनकी,
      गीत हिलमिल गाये  रे
प्राण   प्रभंजन जागे  प्यारे,
      सातों   सुर   लहराए रे !

रंग सारे निखरे पकृति  के,
     कामदेव ने डाला डेरा रे !
अन्तर  स्वर फिर से हेरा रे !

बरसेगी अब शबनम सयानी,
     कुहू-कुहू कोयल की बानी
डाली-डाली    रति    नाचेगी,
     बुढ़ापे को आ जाए जवानी !

फूलों से झूमे ये  बंजर धरती,
     अप्सराओंका  बसेरा    रे !
अन्तर  स्वर  फिर  से हेरा रे !
                 ***
-कृष्णकांत भाटिया  'कान्त'

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