Monday, 17 April 2017

ગઝલ

ऐकडाने घूंटवा आवो तमे
बालपणने लूटवा आवो तमे

ऐटली हुं छूट आपुं छुं हवे
फूल छुं हुं चूंटवा आवो तमे
      
काच पोताने, मने पथ्थर गणे
क्यां कहुं छुं फूटवा आवो तमे !
     
काल मारा स्वप्नमां आव्या हता
फक्त बस त्यां तूटवा आवो तमे !

जीते-जी क्यारेय पण बोल्या नहीं
मोतमां तो कूटवा आवो तमे !
     --- धर्मेश उनागर

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