ऐकडाने घूंटवा आवो तमे
बालपणने लूटवा आवो तमे
ऐटली हुं छूट आपुं छुं हवे
फूल छुं हुं चूंटवा आवो तमे
काच पोताने, मने पथ्थर गणे
क्यां कहुं छुं फूटवा आवो तमे !
काल मारा स्वप्नमां आव्या हता
फक्त बस त्यां तूटवा आवो तमे !
ऐम कै एवा नथी ओछा तमे
ज्यां खरीदुं, खूटवा आवो तमे
जीते-जी बोल्या नहीं, तेथी ज तो
मोत थयुं छे, कूटवा आवो तमे !
--- धर्मेश उनागर
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