Wednesday, 5 April 2017

ગઝલ

हंसने  वाले वो हमारी नजर में रहे,
हमभी हंसती मचलती असरमें रहे।

घर बनाने काअपना तो सपना रहा,
पर अकेले ही हम सुने से घरमे रहे।

साथचलने की ख्वाहीश ने पाला हमें
फीर भी  तनहा अकेले सफर में रहे।

आभी  जाते  अगर वो  लगाते गले,
ये  फसाने  मगर  मुख्तसर  में  रहे।

कीतने  फुरकत के सदमें उठाने पडे,
गम से दो चार  हुवे अश्केतर  मे रहे।

रस्मे  दुनिया का करते रहे पास वोह,
युं  जमाने के मासूम  वो डर में रहे।

                मासूम मोडासवी

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