कुरबत भी रही उनसे पर दुरी निभाते हैं,
कभी आस जगाते हैं कभी प्यास बढाते हैं ।
चाहत की तमन्ना ऐं सीने से लगी हरदम,
हम तेरे सीतम सारे दर पर्दा भुलाते है।
आया ये फसाने में इक मोड नया हमदम,
फुरकत का मिला तेरा हर बोज उठाते हैं ।
उल्फत में तेरी हमने हर रंज को अपनाया,
तु देख जरा हमको हम कैसे निभाते है ।
हर लम्हा तेरी सुरत ख्वाबों मे चली आती,
तु देख नजर भरके हम दिलको जलाते हैं,
आवाज तेरी हमदम बेचैन बनाती है,
नग्मो से भरे तेरे सब सुर लुभाते है।
अंदाजा लगा अबतु मासूम की हालत का,
गमको दबाते है कभी आहो को छुपाते हैं ।
मासूम मोडासवी
No comments:
Post a Comment