Monday, 22 May 2017

ગઝલ

दौर तनहाई का कुछ इस तरह गुजरा है।
जैसे आँखो से निकला समंदर कही ठहरा है।

जूस्तजू आज भी खामोश है तेरी चाहत की,
जरा पूछे कोई होठो पे क्यों इतना पहरा है।

चूरा के नींद वो खाबो में डूबे रहते हैं,
कौन जानता है कि जख्म क्यूँ इतना गहरा है।

हम तो आज भी महेफीलो में नाम उनका लेते हैं,
तभी तो आँख दरिया,और प्यास सहरा है।

खुद को देखे हुए एक जमाना बीत गया,
तेरी यादों की परछाइ में हर वक्त  सुनहरा है।

......वर्षा प्रजापति

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