आपसी जो फुट डाले आदमी को क्या कहुं,
जात की मांगे जझा उस बंदगी को क्या कहुं ।
जोडने वाली करें बातें मगर मनमें भरी,
खारसे लबरेज रखते आस्तीं को क्या कहुं ।
रास्ते खुलते गये हैं मंजिलों की राह के,
बनके आवारा भटकती जिंदगी को क्या कहुं ।
साफ आती है नजर में गम उठाती बेबसी,
हर तरफ फैली जहां में तिश्नगी को क्या कहुं ।
आंखमें आंसु छलकते देख लेते आपभी,
बनके नाकारा तडपती बेकसी को क्या कहुं ।
बन गये हो आप अपने ढंग के मासूम अमीर,
पल रही जो अपने अंदर सादगी को क्या कहुं ।
मासूम मोडासवी
No comments:
Post a Comment