Monday, 17 July 2017

ગઝલ

आपसी जो फुट डाले आदमी को क्या कहुं,
जात की मांगे जझा उस बंदगी को क्या कहुं ।

जोडने वाली करें बातें मगर मनमें भरी,
खारसे लबरेज रखते आस्तीं को क्या कहुं ।

रास्ते खुलते गये हैं मंजिलों की राह के,
बनके आवारा भटकती जिंदगी को क्या कहुं ।

साफ आती है नजर में गम उठाती बेबसी,
हर तरफ फैली जहां में तिश्नगी को क्या कहुं ।

आंखमें आंसु छलकते देख लेते आपभी,
बनके नाकारा तडपती बेकसी को क्या कहुं ।

बन गये हो आप अपने ढंग के मासूम अमीर,
पल रही जो अपने अंदर सादगी को क्या कहुं ।

                     मासूम मोडासवी

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