Monday, 17 July 2017

ગઝલ

सुने पड़े लमहात बसाने  की घड़ी है,
आंखों को लुभाते हुवे मंजर में नमी है।

सावन की ये ऋत देखो घटाओंसे भरी है,
बदली ये बरसने के लिये आन खड़ी है।

छाइ हुइ हैं काली घटाऐं बनी घनघोर,
रीमझीम के तरानों सी जगी नग्मा सरी है।

परखोले चले जाते हैं वापस को परिंदे,
चुगने का सफर खत्म हुवा शाम ढली है।

बे जान पड़ी शाख जवां होने लगी है,
मौजे तरब में आज नइ जान पड़ी है।

अयसे में वो आते तो बड़ी बातथी मासूम,
हर ओर महोबत से भरी धुम मची है।

                      मासूम मोडासवी

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