आओ जनाब बैठो के खिलती बहार है
अपने ही लोग अपने बने फौजदार है.
कांटो को भी बहारका अब ईंतज़ार है
फूलो बगैर खार भी बेशक नजार है
सच बोलता हुं आज सरेआम बझ्म मे
तेरी वजहसे मेरी गज़लमें खुमार है.
अच्छा है दिलको आंख नहीं दी तुने खुदा
दीखता नहीं है फीर भी तुझसे ही प्यार है.
हुस्ने शबाब देखके बोली शराब भी
तेरी वजहसे मेरा नशा कामगार है.
== मंथन डीसाकर (सुरत)
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