Saturday, 29 July 2017

ગઝલ

हालाते जिस्म, सूरती—जाँ और भी ख़राब!
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब!!

नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे!
होंठों पे आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब!!

पाबंद हो रही है रवायत से रौशनी !
चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब !!

मूरत सँवारने से बिगड़ती चली गई !
पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब !!

रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं !
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब !!

आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम !
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब !!

सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िंदगी !
पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब !!


⭐⭐⭐दुष्यंत कुमार⭐⭐⭐

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