दो गज टुकड़ा उजले-उजले बादल का
याद आता है एक दुपट्टा मलमल का
शहर के मंजर देख के चीख़ा करता है
मेरे अंदर इक सन्नाटा जंगल का
बादल हाथी-घोड़े लेकर आते है
लेकिन अपना रस्ता तो है पैदल का
मुझसे आकर मेरी ज़बां में बात करे
लिखता रहता है जो खाता पल-पल का
खुले-खुले से रस्ते के हम आदी है
ध्यान किसे है दरवाजे की साँकल का
मुझको अपने रंग में ढाला दुनिया ने
साँप हुआ हूँ खुद ही अपने सन्दल का
राहत इन्दौरी
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