ग़ज़ल
अय ग़ज़ल पास आ, गुनगुनाऊँ मैं तुझे,
महजूज़ हैं जज़बात मेरे, सुनाऊँ मैं तुझे.
अँगड़ाई पे अपनी तूने दीवाना कर दिया,
चाँदनी रात में ,छत पे बुलाऊँ मैं तुझे.
सिरहाज़ मेरा आज आँसूओंसे लथपथ है ,
दिलेपूर आरज़ू , अपनी बताऊँ मैं तुझे.
अंजुमन में यूँ तेरा , आ कर चले जाना,
असीरों तक तू चल, उड़ाउँ मैं तुझे.
बंदिशे-अल्फ़ाज़ , ही इज़हार है अपना,
हमनवाओं में इसी वक़्त ले जाऊँ मैं तुझे .
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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