Thursday, 24 August 2017

ગઝલ

दर दर भटकते पांव को रस्ता।मिला नहीं,
गुंचा हमारी चाहका शायद खीला नहीं ।

हमको बहाके लाइथी चाहत की आरजु,
उस शोखे ना मुराद ने मौका दीया नहीं ।

साकी ने हंसके प्यार का सागर तो भर दीया,
ऐसा भी क्या हुवा जो हमने पीया नहीं ।

अरमां जगाने आयेथे दिल के करीब वो,
उसने हमारे साथ में  दो पल जीया नहीं ।

जागी तलब के तोरके सपने जगा गये,
बदली निगाहे शोख का मासूम गीला नहीं ।

                   मासूम मोडासवी

No comments:

Post a Comment