आसाँ नहीं होता है चाहत को भूला देना
तपते हुए सहरा की राहत को भूला देना
जिस यार की बातों से मिलता था सुकूँ दिल को
मुमकिन कब है उसकी सोहबत को भूला देना
थक हार गए हों जब दुनिया के झमेलों से
कुछ पल जो मिल जाए फुरसत को भूला देना
हो लाख अमीरी पर,जो हाथ पसारा हो
नामुमकिन ही है उस गुरबत को भूला देना ।
सुनीता सामंत
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