इरादे हमारे कहां तक गये,
जमींसे कदम आस्मां तक गये।
मीला ये हमें रुत्बा तालिम से ,
मैदां से निकले मकां तक गये ।
निभाइ बहोत हमने खामोशीयां,
खुली ये जबां तो बयां तक गये।
छुपाया सदा अपने हालात को ,
सीतम पे तेरे सब अयां तक गये।
तेरे दरसे ही अपनी रहीं निसबतें ,
खुशी से हम तेरे आस्तां तक गये। ।
उठाया हमेशा गमे जिंदगी को ,
सजाने को नये आशीयां तक गये।
खीदमत का जज्बा दीखाते रहे
सीयासीये कातिल कहां तक गये।
बड़ी उनकी मासूम इनायत रही ,
मीली ना खुशी हम जहां तक गये।
मासूम मोडासवी
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