Thursday, 12 October 2017

ગઝલ

इरादे  हमारे  कहां  तक   गये,
जमींसे कदम आस्मां तक गये।

मीला  ये हमें  रुत्बा तालिम से ,
मैदां  से निकले मकां तक गये ।

निभाइ बहोत हमने खामोशीयां,
खुली ये जबां तो  बयां तक गये।

छुपाया सदा अपने हालात को ,
सीतम पे तेरे सब अयां तक गये।

तेरे दरसे ही अपनी रहीं निसबतें ,
खुशी से हम तेरे आस्तां तक गये। ।

उठाया  हमेशा  गमे  जिंदगी को ,
सजाने को नये आशीयां तक गये।

खीदमत का जज्बा दीखाते रहे
सीयासीये कातिल कहां तक गये।

बड़ी उनकी मासूम इनायत रही ,
मीली ना खुशी हम जहां तक गये।

                       मासूम मोडासवी

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