Thursday, 12 October 2017

અછાંદસ

ज़ख्म की नग्नता से
जो बहुत शर्म आये
तो सपने का टुकड़ा फाड़कर
उस ज़ख़्म को ढाँप ले

इस जेल की यह बात
कोई कभी न करता

और कोई कभी न कहता
कि दुनिया की हर बगावत
एक ज्वर की तरह चढ़ती
ज्वर चढ़ते और उतार जाते

काश कभी इंसान को
आशा का कैंसर न होता...

अमृता प्रीतम

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