ज़ख्म की नग्नता से
जो बहुत शर्म आये
तो सपने का टुकड़ा फाड़कर
उस ज़ख़्म को ढाँप ले
इस जेल की यह बात
कोई कभी न करता
और कोई कभी न कहता
कि दुनिया की हर बगावत
एक ज्वर की तरह चढ़ती
ज्वर चढ़ते और उतार जाते
काश कभी इंसान को
आशा का कैंसर न होता...
अमृता प्रीतम
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