अस्तित्व
दिप का अस्तित्व
दिपक...
स्वयंममे उजाला करतां
अपने आप को जलाता
जल गया
अंधेरा ख्वाबका और ख्वाईशोका बन गया
उसी खोपडीके भीतर था
अस्तीत्व किसी कोनेसे जाकता
और आँखो से कापतां
नाचतां...
थम जाती थी धुधरुकी आवाज...
तब दिप जलता था
दिपके बुजते ही...!
थिरकन था था
किर्तन सा सा
वादियो से पडधाती चित्कार
मशाल जलाती थी
लालटेनको लीये पीछा करते राजन..
सुन
अटहास्य करती
रोती बिलखती परछाईया
मंडराती किक्यार्या..
चौदशी रात और ये..!
चारो दिशा से चित्कार्ति...!
विक्रम....चल अकेला...
वेताल वन ढकेला
रातके सन्नाटोमे
शमसेर लिये...
बढा था कब कोई?
चामाचिडियोकी आवाजसे थका हुवा
उल्लु रोता था बालककी भाती
करवट लेता था मौसम
तब-तब अमावस्याकी
आधी रात....
धुधवाती थी
साया बनता...
साया थंभता..
जब-जब
उथलाता उपवनको
हर रात के बीच...
चिखता था अस्तित्व..
न्यायके नायक विक्रम....
आवो....आवो....
ऐक कहानि को फिर सुलजावो
अन्याय के कांटो को
न्याय से काटो
जलते दिपकको फिर से जलावो...
बुजनेका सवाल था ?
भितर से बुजादो...!
आव....
काली रात का अस्तिव
मिटादो...!
या फिर जश्न मनावो
दिपक की रात
जलकर बुजादो..
अस्तित्व दिनमे छुप गया
रातको छुपालो...!
नजर नही आये तो
सूरत अपनी जलालो
जादु नगर दर्ज किया
खुदगर्ज को जलालो
राजन ऐक कहानिमे..
खुदको मढालो..
तसविर अस्तित्व की शरणमे? जला-बुजा दिप...
निर्भय..
विक्रमराजा का
अस्तित्व
स्मित..
अटहास्य और चिख..
जाग्रुति मारु महुवा "जागु"
No comments:
Post a Comment