Tuesday, 20 March 2018

ગઝલ

उनके सितमकी बात ही न पूछिए
इश्क़ करने वालोंकी ज़ात न पूछिए

दिन गुज़रा हो तन्हाई में जिसका
कैसे गुज़री फिर ये रात न पूछिए

जिसकी खामोशीमे ही है ज़वाब छिपे
ऊनसे कोई अब सवालात न पूछिए

वज़ह ज़ख्मकि हो जो कोई हमनवा
फिर कभी उनके ज़ज्बात न पूछिए

आग़ाज़"परम"इश्कका हो चूका हो तो 
फिर वो"पागल"को अँजाम न पूछिए

- परम पागल

No comments:

Post a Comment