हर मोड पे ऐसे हमे मंझर मिले।
हर आँखमें जैसे छिपे खंजर मिले।
नादान बनकर लूंटते है जो हमे।
जजबात वो सारे मिरे अंदर मिले।
मुर्जा गया जो खुद गमोकी आगमे।
उस पेडको तो हर जगा बंजर मिले।
उसने दिये थे जो हिरे थैली भरे।
मैने निकाला रात को;कंकर मिले।
सच बोलना इतना कहाँ आसान था!
खामोश चहेरो में छिपे हंटर मिले।
# किरन जोगीदास
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