Sunday, 3 June 2018

ગઝલ

मोहब्बत का इतना तो सीला दो,
अपने हाथों से कोई जाम ही पिला दो,
.
बोतल से जाम चढ़ती ही नही मुझे
अपनी नजरो के प्यालो से पिला दो,
.
पिला दो ऐसी के बहेक जाऊ खुशनसीब
अपने होठों का नशा भी मिला दो,
.
क्या करना है मिला के कुंडली कागज की
मोहब्बत में मुझसे दिल ही मिला दो,

साँसे ये रुकी है इसी इंतेज़ार में
अपने चाँद से चहेरे का दीदार ही करा दो।

✍🏻 *सुनील पारवाणी*

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