Monday, 5 September 2016

गझल

कुछ सुख के ही ख्वाब दे मौला,
या दर्द मुझे बेहिसाब दे मौला।

चोखट पर आंसु की बुंदे बिखेर दी है,
अब हर आंसु का जवाब दे मौला।

तेरे बगैर कीतनी काटी है राते, बताउ!
अब वो हिज्र का हिसाब दे मौला।

मै भी जिंदगी जी सकु,मेरे मुताबिक,
मेरे हिस्से का कुछ असबाब दे मौला ।

'आभास' खुद को ना पहचान शकुं यहां,
कुछ ऐसा ही हिजाब दे मौला।

-आभास

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