Saturday, 22 October 2016

ગઝલ

मूर्ति  क्यां छु, क्यां  शिखरनी जेम  ऊभो छुं
चित्तनी चट्टान उपर हुं नगरनी जेम ऊभो छुं
           
आ तमारी आंख छे के पांपणोनी चार दीवालो?
हुं तमारा घर विषे मारा ज घरनी जेम  ऊभो छुं
   
क्यांय क्यारेय कोई रस्ताओ मने घेरी नथी शकतां
फक्त ऊभो छुं अने कारण वगरनी जेम ऊभो छुं

मारी अंदर माईलोना माईलो केवल प्रवेशे छे
हुं ज मारामां पूरी थाती सफरनी जेम ऊभो छुं
         
खालीपो!हा,खालीपो केवल भरातो जाय छे ऐमज
साव खाली छुं  छतांऐ मातबरनी जेम ऊभो छुं

             भरत भट्ट

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