Sunday, 6 November 2016

ગઝલ

मत्ला विनानी गझल

लो ,समाधान थई गयुं कस्तर
ने  समस्या पहाड थई  गई छे

खीणमां मौन सदाय  पडघातुं
मनमां केवी तिराड थई गई छे

दिल दर्पणनी जेम किधु ,तो
ऐक नानी तिराड थई गई छे

थई  गया छे  सवाल  पंखीओ
झंखनाओ तो झाड थई गई छे

ज्यारे आव्यु छे आपनुं  स्मरण 
त्यारे,आंखो अषाड थई गई छे

साव  मूंगा  बनी  गया  अक्षत
ऐक मगनी बे फाड थई गई छे

आपणे ओह !  धाडपाडुओ ?
ऐक सहियारी धाड थई गई छे
    
          भरत भट्ट

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