घणु बेठां हवे तो चालवुं पडशे
तने गूडबाय कही दउं के जवुं पडशे
नजर सामे दिशाओ छे दिगंबर छे
तो झबलुं मापसरनुं सीववुं पडशे
न बोलुं तो सजा छे मौन रहेवानी
अबोलुं नाम ऐ उच्चारवुं पडशे
उकलतुं झांखुपांखुं जाय छे जीवण
अगोचर ऐ अलखने वांचवुं पडशे
.. . .भरत भट्ट
મુકતક
शिखर पर धारणाओनी कसोटी पण करी लईऐ
हवानी ल्हेरखी आवे तो थोडुं फरफरी लईऐ
तुं अंधारे के अजवाले सतत चूपचाप शोधे छे
अमारी ऐ ज ईच्छा के तने पण छेतरी लईऐ
भरत भट्ट
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