Monday, 7 November 2016

ગઝલ

घणु  बेठां  हवे  तो  चालवुं   पडशे
तने गूडबाय कही दउं के जवुं पडशे

नजर सामे  दिशाओ छे दिगंबर छे
तो  झबलुं मापसरनुं सीववुं  पडशे

न बोलुं तो सजा छे मौन रहेवानी
अबोलुं नाम  ऐ  उच्चारवुं  पडशे

उकलतुं झांखुपांखुं जाय छे जीवण
अगोचर ऐ अलखने वांचवुं पडशे

     ..  . .भरत भट्ट

                      મુકતક

शिखर पर धारणाओनी कसोटी पण करी लईऐ
हवानी ल्हेरखी आवे तो थोडुं फरफरी लईऐ
तुं अंधारे के अजवाले सतत  चूपचाप  शोधे छे
अमारी ऐ ज ईच्छा के तने पण छेतरी लईऐ
           
              भरत भट्ट

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