Saturday, 17 December 2016

ગઝલ

[12/18, 11:24 AM] Bharat Bhatt: ऐक जंगल जे विकसतुं जाय छे
बीजुं जंगल ऐ सुकातुं  जाय  छे

पंखी डोकातुं रहे छे बारीऐ
ऐम तरणाथी तूटातुं जाय छे

वृक्ष छुं केवल उझरडाओ रह्या
पोत मारुं पण भूलातुं जाय छे

तुं जेने मोसम  गणे  छे,  मात्र ऐ
खोखलुं थई आम खरतुं जाय छे

बेउना माटे लखातुं जाय  छे
बेउनुं  भीतर भूंसातुं जाय छे

             भरत भट्ट

No comments:

Post a Comment