Monday, 30 January 2017

ગઝલ

साकी पे इल्ज़ाम न आये !
चाहे मुझ तक जाम न आये !

कतरा क़तरा पिला न ऐ साक़ी !
ओस से प्यास भी बुझी है कभी !

साकिया तश्नगी की ताब नहीं !
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं !

तेरे सिवा जो की हो मुहब्बत !
मेरी जवानी काम न आये!

जिनके लिये तो मर भी गये हम !
वो चल के दो गाम न आये !

इश्क का सौदा इतना गराँ है !
पूरे हमसे दाम न आये !

मैखानेमें सब ही तो आये !
लेकिन 'जिगर' का नाम न आये !

- जिगर मुरादाबादी

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