बस ये राज़ को अब तुम सदा राज़ ही रहने दो
भरम उनकी निगाहों का निगाहमे ही रहने दो
अब ये सर जमीं की ज़ंज़ीरो से मुक्त हो चूका हूँ
मुज़को अब असीम आकाशकी बाहोमे रहने दो
अब निखार चूका हूँ मैं खुदको दर्द की बोछारोसे
अब हर उठने वाली आह को आहोमे ही रहने दो
गुजर चूका हूँ ज़माने के हर सख्त इम्तिहानो से
अब हर नतीजे को किताबोमे ही बन्ध रहने दो
"परम" मंज़िल खुद आज आई है चलकर मेरे पास
"पागल" राहों की बाते नक्शो में ही बन्ध रहने दो
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