Tuesday, 10 January 2017

ગઝલ

गझ़ल

सूर्यनी  लालाश  धमधमती रही
आ उदासी सांज आथमती रही

गाम अथडामणमांअटवायु अने
छोकरीओ   शेरीमां  रमती  रही

कोई आवी स्वप्नवत् ठहरी गयुं
पोपचामां  रात  निर्गमती  रही

शब्द मूंगा रही गया सिसकारता
वेदनाओ तीखी  तमतमती  रही

ऐक   समये  प्रिय  राजाने  हती
ऐज राणी आज अणगमती रही

                 भरत भट्ट

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