Monday, 23 January 2017

અછાંદસ

अंजली...

ऐ खुदा कयामत
आज के दोपहर
हवाकी नर्मीया लहरोमे बदलाव
मन बेचेन ओर ठहराव?
शहरके कोलाहल के दौरानभी...!
न जाने....?
कुछ अघटीत घटनाके कई विचारोने धैरा ...
तभी मनके संन्नाटोके बीचमे, घडियालमे बजे बारा ...!
चौराहेका टावर बजने लगा...
एक-एक करके बारह घंटोके बजनेकी आवाज..!
टटोलते हुए,
न जाने मेरे मन को बजाया... !
घंटी बजी जैसे गमगीनी बढी
डाकिया आया ओर..!!
चला खतको थंभाके हाथमे..
लिफाफा कापते हुए हाथने खोला
अपने पतझडके वंनमे...!
गीरा जमीनदोस्त पेड
आखीरमे लीखी श्रध्धांजली.. .!
यादोके अतितको स्मर्णाजली ...!
पेडको पत्तोके बीना देखकर
डूबता सूर्य न जाने रातको परलोक चला...
एक के बाद एक पेड था...!!
पतझडमे कमजोरीकी केड?
नाईलाज थी.!!
मौसम,हवा,जमीन,पानी सब वैसेका  -वैसा...
खाली चिडियोके झरुखोसे सजी हूई झडे...
अचेतन ...!
दर्दको सेहता मन,
आजभी कवि और कविगण.!!
कविताके जरिये फिरता बन..!
ऐक श्रध्धा अँजली और ..
एक फूल..
हाथमे से उडी तितली और ये रंग..
जैसे..
अंजली आंख से गीरी सावन,
गमगीनी थी एक चेतना  क्या?
य़े अचेतन मनको ढुढती...
ऐ खुदा जुदाईको आज
शब्द अंजली
अंग जली..
यादोकी बैसाखीके सहारे
थकी हवा सांसोकी और..
रुकी जैसे आज
श्रध्धांजली साझ-बिछाये
अंजली

जाग्रुति मारु "जागु"महुवा

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