Tuesday, 10 January 2017

ગઝલ

सपन कितना सलोना चाहती थी
तिरी महबूब होना चाहती थी

ये मोहलत ही नहीं दी ज़िंदगी ने
मैं तेरे साथ रोना चाहती थी

तिरी साँसों की ख़ुशबू से भरे हों
मैं ऐसे फूल बोना चाहती थी

तिरी आग़ोश में आ कर ये जाना
कि मैं सदियों से सोना चाहती थी

ये मेरे आँसुओं की इंतिशारी
तिरे ग़म का बिछौना चाहती थी

मयस्सर ही न हो पाया मुझे तू
में ख़ुद को तुझ में खोना चाहती थी

नीना सहर

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